जंगल सूने, शहर भरे: गिद्ध अब इंसानों से शर्मा रहे हैं!

 ‘गंवार’ महेंद्र गौड़
गंवार’ महेंद्र गौड़

कभी आसमान में चक्कर काटते गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी कहलाते थे। वे मृत शरीर खाते थे, जीवितों पर हमला नहीं करते थे। आज हालात उलटे हैं। जंगल के असली गिद्ध कम होते जा रहे हैं, और शहरों में रूपक वाले गिद्धों की आबादी रिकॉर्ड तोड़ रही है।

जटायू केंद्र में सन्नाटा

चित्रकूट में बने जटायू गिद्ध संरक्षण व प्रजनन केंद्र का मकसद था लाल गर्दन वाले गिद्धों की संख्या बढ़ाना। लक्ष्य रखा गया था कि 20 साल में 40 से 50 जोड़े तैयार होंगे। सहयोग में Bombay Natural History Society भी शामिल है।

शिलान्यास, उद्घाटन, फीता, तालियां, भाषण। सब कुछ हुआ। उद्घाटन मंच पर दो नर और आठ मादा गिद्ध भी मौजूद थे। कम से कम वे कैमरे से नहीं भागे। उसके बाद से जंगल में सन्नाटा है। रेस्क्यू टीम 18 दिन डेरा डालकर लौटी, एक भी नया गिद्ध नजर नहीं आया।

लगता है असली गिद्धों को खबर मिल गई कि यहां प्रतिस्पर्धा कठिन है।

शहरों के गिद्धों की ‘प्रजनन दर’ शानदार

प्रकृति वाले गिद्ध मृत शरीर खाते हैं। सामाजिक गिद्ध जीवित इंसानों की उम्मीदें नोचते हैं। कोई त्रासदी होती है तो कुछ लोग मौके की तलाश में सक्रिय हो जाते हैं। मदद के नाम पर सौदेबाजी, संवेदना के नाम पर राजनीति, और शोक के बीच सेल्फी संस्कृति।

जंगल में गिद्ध विलुप्ति की ओर हैं। लेकिन शहरों में इनकी ‘सामाजिक प्रजाति’ पूरी तरह सुरक्षित, संरक्षित और सम्मानित है। कुदरत के गिद्ध कम हैं क्योंकि वे केवल मृत शरीर खाते थे। समाज के गिद्ध इसलिए अधिक हैं क्योंकि वे जिंदा हालातों को भी अवसर में बदल लेते हैं।

असली संकट किसका?

यह व्यंग्य सिर्फ पर्यावरण पर नहीं, हमारे नैतिक पर्यावरण पर भी है। सरकार असली गिद्धों को बचाने के लिए योजनाएं बना रही है। दूसरी ओर समाज उन लोगों को मंच देता है जो संवेदनाओं की लाश पर भाषण देते हैं।

शायद गिद्धों ने तय कर लिया है कि वे इंसानों के समाज में नहीं आएंगे। उन्हें डर है कि उनकी पहचान छिन जाएगी। यहां पहले से ही इतने ‘प्रतिभाशाली’ गिद्ध मौजूद हैं कि असली वाले बेरोजगार हो जाएं।

शर्म किसे आनी चाहिए?

गिद्ध इसलिए नहीं मिल रहे क्योंकि वे इंसानों से शर्माने लगे हैं। यह पंक्ति व्यंग्य नहीं, आईना है। जब जंगलों में खोज अभियान चल रहा हो और शहरों में अवसरवाद का उत्सव, तब सवाल पक्षियों का नहीं, इंसानियत का है।

कुदरत की प्रजातियां बचाने के साथ शायद हमें अपने भीतर की प्रजातियों पर भी काम करना होगा। वरना एक दिन बच्चे पूछेंगे, गिद्ध कैसे होते थे? और हम जवाब देंगे, बेटा, आईने में देख लो।

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